आप कभी जब पुरोला से त्यूनी की तरफ़ आ रहे हो तो आपको देहरादून और उत्तरकाशी जिलों की सीमा से थोड़ा आगे चातरा गाँव के ठीक सामने टोंस नदी के पार ठडियार गाँव में एक मन्दिर दिखाई देता है। यह पवासी देवता का मन्दिर है। असकोट-आराकोट अभियान के दौरान इस बार जब उधर से पैदल गुजरना हुआ तो देखता हूँ कि पवासी देवता के मन्दिर के बाहर एक बैल की भीमकाय मूर्ति स्थापित की गयी है जो दूर से ही नजर आ जाती है। क्योंकि अभियान में शामिल लोगों को रात हनोल में ही गुजारनी थी, सो जिज्ञासावश मैं थोड़ी देर के लिए ठडियार भी चला गया। पवासी देवता देवबन के प्रवास पर थे जो ठडियार से लगभग 12-13 किलो मीटर उपर पहाड़ की चोटी पर स्थित है। वहाँ बैठे लोगों के साथ बातचीत के दौरान मूर्ति का भी जिक्र किया तो पता चला की यह नन्दी महाराज की मूर्ति है। इसमे कोई दो राय नही है कि जिस किसी ने भी यह मूर्ति बनायी है, शानदार बनाई है और कलाकार की कला प्रशंसनीय है लेकिन पवासी देवता का नन्दी से संबंध बहुत अटपटा लगा। मैने वहाँ बैठे लोगों से जब इस बावत पूछताछ की तो उन्हे लगा कि मैं शहरी समुदाय से हूँ सो पहले तो उन्होने चारो महासू भाईयों को एक किया फ़िर उन्हे महाशिव का अवतार बताने लगे। मैने पूछा कि क्या महासू के महाशिव के अवतार होनेके कोई प्रमाण है, तो वह कहने लगे कि किसी से भी पूछ लिजिए। मैने फ़िर उनसे सवाल कियाकि क्या इस श्रेत्र में पीढियों से महासू देवता से संबंधित गाये जाने वाले किसी भी लोकगीत में महासू के महाशिव होने का जिक्र मिलता है, क्या आपके दादा-परदादा जानते थे कि महासू भाई महाशिव के अवतार है, तो वहाँ बैठे सज्जन बगलें झाँकने लगे। मैंने उन्हे बताया कि मैं भी इसी टोंस घाटी का मूल निवासी हूँ। महासू मेरे परिवार के भी इष्ट देव है और बचपन में मैं अपने परिवार के साथ कई बार यहाँ आता रहा हूँ।
पूर्व में महासू भाईयों के प्रभाव का इस बात से अन्दाजा लगाया जा सकता है कि हिमाचल प्रदेश का वर्तमान जिला शिमला एक जमाने मे महासू के नाम से जाना जाता था। सांस्कृतिक ह्वास के चलते अब यह प्रभाव हिमाचल प्रदेश में केवल जुब्बल तहसील तक सीमित हो गया है। टोंस-जमुना घाटी के श्रेत्र में महासू देवताओं के अलग अगल स्थानों पर मन्दिर स्थापना की अलग-अलग जनश्रुतियाँ है। यदि भौगोलिक दृष्टि से देखा जाय तो महासू देवताओं का प्रभाव हिमाचल के शिमला और सिरमौर जिलों से लेकर उत्तराखण्ड के टिहरी, उत्तरकाशी और देहरादून जिले के श्रेत्रों में पाया जाता है। ऐसा मान्यता है कि महासू चार भाई हैं, जिसमे सबसे बड़े बाशिक देवता का मन्दिर हनोल और त्यूनी के मध्य मैंद्रथ नामक स्थान पर स्थित है। दूसरे भाई बोठा देवता का मन्दिर हनोल में ही है, तीसरे भाई पवासी देवता है जिनका श्रेत्र बंगाण पट्टी पड़ता है। चौथे भाई चालदा हिमाचल के जुब्बल से लेकर पूरे जौनसार में एक निश्चित समयावधि के लिए भ्रमण करते रहते है। जनश्रुतियों में महासू देवताओंकी माँ देवलाड़ी का जिक्र तो मिलता है लेकिन इनकी पत्नी एवं बच्चों का कोई जिक्र नहींमिलता।
मुझे याद है बचपन में जब मैं अपने दादा के साथ हर वर्ष बैसाख माह में हनोल की यात्रा करता था। उस समय अधिकतर लोग पैदल ही हनोल जाते और मन्दिर में देवता के नाम की रात लगाकर वापिस अपने गाँव घरो को लौट आते। मुझे अब महसूस होता है कि मुझे मेरे दादा का इस तरह की यात्राओं में साथ ले जाना अपनी इस संस्कृतिके हस्तांतरण जैसा था। वह बताते थे कि उनके दादा भी उन्हे ऐसे ही उन्हे हनोल लेकर जाते थे। शायद यह एक ऐसी प्रक्रिया रही होगी जो सदियों से चली आ रही होंगी और मेरे तथा मेरे दादा की तरह महासू श्रेत्र के लोग भी पीढी दर पीढी इस तरह की यात्राओं के प्रतिभागीबनते होंगे। ऐसी मान्यता है कि महासू के नाम की यात्रा यदि पैदल की जाये तो बहुत पुण्यमिलता है। भेंट स्वरुप साल में अनाज के साथ-साथ बकरा भी देवता को चढाया जाता। यह मन्नतपर निर्भर करता कि बकरे की बलि देनी है या मन्दिर में छोड़ आना है। ऐसा प्रतीत होताहै कि पूर्व में इस श्रेत्र के मूल निवासियों की अर्थव्यवस्था कृषि एवं पशुधन प्रधानरही होगी।
लेकिन आज स्थिति बिलकुल उलट है। इस श्रेत्र का शिक्षित तबका महासू का आधुनिकिकरण कर महाशिव करने पर तुला हुआ है। इसमे कोई दोराय नहीं कि महाशिव देवों के देव है तथा हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से है लेकिन क्या पायजामे की जगह पैंट के आते ही इस तरह से आस्था का स्थांतरण इस आदिम संस्क़ृति के लिए ठीक होगा ये सोचने वाली बात है। क्यों हम इन बातों का तार्किक संज्ञान नहीं लेते कि महाशिव संहार के देवता है जबकि महासू न्याय के देवता है, महासू पशुचारकों के देवता है, महासू कृषकों के देवता है। जब महासू देवताओं का कोई प्रमाणित लिखित इतिहास नहीं है तब हम क्यों नही अपने बड़े बुजुर्गों से महासू देवताओं के बारे में मालूमात करते? हमे नहीं भूलना चाहिए कि टोंस और जमुना की संस्कृति के स्रोत महासू भाई है। जिस दिन महासू देवताओं का अस्तित्व नहीं रहेगा, उस दिन इस श्रेत्र के लोगों के सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्य भी नष्ट हो जायेंगे। अगली पीढियों से तालमेल की कमी के कारण सामाजिक एवं सांस्कृतिक ह्वास सभ्यताओं में अक्सर देखने को मिलते हैं और यह श्रेत्र इसी राह पर है। इतिहासकार डा. शेखर पाठक, जो असकोट आराकोट अभियान के प्रणेता है तथा कुमाऊँ विश्वविध्यालय मे प्रोफ़ेसर रह चुके है, वो एतिहासिक दृष्टिकोण से महासू भाईयों को पशुचारकों एवं कृषकों का आराध्य बताते हैं तथा इसी आधार पर टोंस-जमुनाधाटी की सभ्यता को दुनिया की पुरानी सभ्यताओं में शुमार करते हैं जो अभी कुछ हद तक सुरक्षित मानी जा सकती है। वो आगे कहते हैं कि यदि यही हाल रहा तो एक दिन यह श्रेत्र अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान खो देगा।
यदि आप टोंस-जमुना घाटी में विचरण करेंगे तो आपको ज्ञात हो पायेगा कि महासू देवता इस श्रेत्र के आराध्य ही नहीं बल्कि सभ्यता के सतंभभी है। श्रेत्र का सारा सामाजिक और सांस्कृतिक ताना बाना महासू देवताओं और उनके नायबों के इर्द गिर्द ही घूमता है। आप पायेंगे कि इस श्रेत्र के वार-त्योहार और आराधना के स्रोत महासू देवता या उनके नायब ही हैं।
तेज भागती दुनिया और वैश्विकरण के इस दौर में यह सारी बाते बेमानी लग सकती है, लेकिन यदि हम पर्यावरण की बात करते हैं, हिमालय को बचाने की बात करते हैं और गंगा को बचाने की बात करते हैं तो हमे हिमालय के इन नदी घाटी श्रेत्रों को, इनकी संस्कृति को और इनके सामाजिक ताने बाने को संरक्षण देने की आवश्यकता है। हिमालय के इन श्रेत्रों के निवासी प्रकृति प्रेमी हुआ करते थे, इनका पर्यावरण संरक्षण का अपना तरीका होता था, लेकिन अब ऐसा नहीं दीखता।
लकड़ी एवं अन्य वन उपज की तस्करी ने एक नये किस्म की कुव्यवस्था को जन्म दे दिया है। बाँधों एवं अन्य व्यवसायिक गतिविधियों में किसी भी किस्म के मापदण्डों का न अपनाया जाना पारिस्थितिकी में सैंध लगाने जैसा है। राज्य का सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा पड़ा है। विकास और उपभोग के इस बेतरतीब माडल ने यहाँ के लोगों को सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक रुप से कंगाल कर दिया है। उपर से स्थानीय राजनैतिक नेतृत्व कोढ में खाज साबित हो रहा है। सरकार को चाहिए कि यदि वो पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखाना चाहती है तो उसके एक महत्वपूर्ण भाग, इन आदिम समुदायों के संरक्षण की कवायद तुरंत और त्वरित प्रभाव से शुरु कर देंनी चाहिए ।

 

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2 COMMENTS

  1. स्थानीय देवी देवताओं पर क्षेत्र वासियों की बहुत आस्था होती है. पीढ़ी दर पीढ़ी आस्था का हस्तांतरण मेले, तीज त्योहारों के माध्यम से होता है. परन्तु ऐसे में अपने स्थानीय देवी देवताओं को बडे परिपेक्ष में दर्शाने हेतु (या किसी भी कारण से) इन्हें शिव या दुर्गा से जोड़ना कतई उचित नहीं है. ऐसे समय में ‘आपका लेख लोक देवताओं को भी संरक्षण की आवश्यकता है’, बेहद आवश्यक हो जाता है.
    कभी कभी गाँव के बुजुर्ग ऐसी बातें आने वाली पीढ़ी को अपनी बात मनवाने के लिए या यू कहें उनकी आस्था बनाये रखने के लिए कह देते हैं. ऐसे में आपका उनसे तर्क कर साबित करने को कहना बहुत अच्छा है बेहद जरुरी भी है. अन्यथा आने वाले समय में स्थानीय देवी देवताओं का अस्तित्व वास्तव में खतरे में आ जायेगा.

  2. बहुत खूब श्रीमान जी , मेरे मन में भी ये जिज्ञासा काफी समय से थी की देवो के देव महाशिव और न्याय के देवता महासू महाराज की पृष्ठभूमि एक ही है या अलग । इस वैश्वीकरण के युग में कही ऐसा न हो की टोंस जमुना घाटी अपना अस्तित्व ही खो दे । इसके अस्तित्व को बनाये रखने के लिए हमारे बड़े बुजुर्गों द्वारा युवाओं का मार्गदर्शन करना अनिवार्य है ।

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