देश में राजनीति का शिकार होने से सीबीआई तक नही छूटी। शर्मनाक

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अमित सेमुअल- सीबीआई पर देश भर के लोग ऐसे चुटकी ली रहे हैं जैसे यह देश की सबसे बड़ी और बेहतरीन जाँच एजेंसी नहीं बल्कि कोई ऐसी डांसर हो जो अपने मालिकों के लिए नृत्य करती है । खुश करने हेतु जैसे राजा — महाराजा और बादशाहों के समय नर्तकियां होती थी आज सीबीआई है । सीबीआई को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कभी “पिंजरे में बंद तोते” की उपाधि दी थी उसके वाबजूद न्यायालय ने इसकी आजादी का कोई आदेश नहीं दिया जिसके परिणामस्वरूप सीबीआई आज सबसे अधिक शक के दायरे में है । अब समय आ गया है कि सीबीआई पर गंभीर बहस हो और इस संस्था को कैसे संवैधानिक बनाकर इसे पुनः साख हासिल हो उस पर चर्चा की जाए ।

हमारे देश में इंटेल और जाँच की तीन प्रमुख टॉप एजेंसियाँ हैं ; रॉ, आईबी और सीबीआई । इन पर देश की न सिर्फ वाह्य या आंतरिक गुप्त सूचनाएं प्राप्त करने का अधिभार है बल्कि ये देश के लिए अत्यंत आवश्यक हैं मगर इन एजेंसियों में राजनीतिक हस्तक्षेप इनकी कार्यकुशलता और प्रोफेशनलिज्म पर सबसे बड़ा हमला है । हम विस्तार से इस पोस्ट पर चर्चा करेंगे ।

संविधान का “अनुच्छेद 1” कहता है — “भारत अर्थात इंडिया , राज्यों का संघ होगा ।

संविधान में संघ और राज्यों के बीच के संबन्ध स्पष्ट किये गए हैं जिन्हें “संविधान के भाग 11” में दिया गया है जो भारतीय संविधान के “आर्टिकल 245 से लेकर आर्टिकल 291” तक विस्तृत हैं, जिसमें संघ और राज्यों के अधिकार स्पष्ट किये गए हैं । इसके अलावा संविधान में जो अनुसूची दी गयी हैं, उसमें “पहली और सातवीं अनुसूची” में इन अधिकारों को पुनः स्पष्ट किया गया है । इसके वाबजूद जो लोग संविधान की जानकारी के बिना किसी प्रधानमंत्री या केंद्र सरकार को सर्वशक्तिमान मान लेने की भूल करते हैं वे खुद संविधान का ABC भी नहीं जानते हैं ।

प्रधानमंत्री कोई बादशाह , सम्राट या राजा नहीं है जो निरंकुश होकर शासन करे बल्कि वह संविधान के अनुसार ही शासन कर सकता है मगर हमारा दुर्भाग्य है कि देश की 99 प्रतिशत जनता संविधान और कानूनों को जानती तक नहीं , निरंकुशता का यही आधार भी है ।

बंगाल में जो हुआ वह बहुत अधिक चिंतनीय विषय है लेकिन कानून के आधार पर पश्चिम बंगाल सरकार सही है जिसे आज माननीय सर्वोच्च अदालत ने अपने आदेश में सही साबित किया है । सीबीआई हो या प्रधानमंत्री कोई भी लोकतंत्र में मनमानी नहीं कर सकता है मगर हमारे संविधान में प्रधानमंत्री की निरंकुशता से निपटने का कोई उपाय भी नहीं किया गया है जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति हो या ब्रिटिश प्रधानमंत्री उसकी निरंकुशता पर “युक्तियुक्त प्रतिबन्ध” हैं ।

अमेरिकी राष्ट्रपति को वीटो का अधिकार है तो संसद को महाभियोग का अधिकार भी है जिससे संसद उसे हटा सकती है मगर हमारे यहाँ महाभियोग राष्ट्रपति पर लागू होता है मगर वास्तविक कार्यकारी प्रमुख प्रधानमंत्री पर कोई नियंत्रण नहीं है । सरकार लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है मगर जब लोकसभा में किसी पार्टी का पूर्ण बहुमत हो और पीएम निरंकुश होकर शासन चलाये तब कोई भी उपचार संविधान में नहीं है जिसमें सुधार की नितांत आवश्यकता है । केवल चुनाव ही उपचार नहीं हो सकते , पता नहीं क्यों आज तक इस मामले को कोई भी दल कोर्ट में नहीं ले गया है ? इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी ने यह साबित किया है कि पीएम पर भी युक्तियुक्त प्रतिबन्ध होने ही चाहिए ।

भारत के पास मुख्यतया तीन प्रमुख इंटेलिजेंस एजेंसियाँ हैं ; रॉ , आईबी और सीबीआई । सीबीआई का कार्य इंटेल के अतिरिक्त मुख्यतया भ्र्ष्टाचार और अपराधों (कहने पर ) की जाँच का है ।

आईबी की स्थापना 1887 में अंग्रेजों ने की थी जिसका कार्य जासूसी कर सूचनाएं एकत्र करना था । आजादी के बाद इस एजेंसी का काम देश के अंदर और बाहर से सूचनाएं एकत्र करना था । किसी भी राष्ट्र के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण विभागों में से एक होता है , जिसे इसके पहले डायरेक्टर ने ब्रिटेन की ‘MI 5’ की तर्ज पर चलाने की कोशिश की थी मगर 1962 और 1965 में यह महसूस किया गया कि आंतरिक और वाह्य सूचनाओं हेतु अलग — अलग एजेंसियों की जरूरत है अतः 1968 में आईबी से अलग “रॉ” की स्थापना की गई जिसका कार्य विदेशों से सूचनाएं प्राप्त करना है जबकि आईबी का कार्य देश के अंदरूनी भाग से सूचनाएं प्राप्त करना और उपयुक्त रणनीति बनाना है । आईबी और रॉ दोनों ही एजेंसियाँ ऑपरेशनल कार्य भी करती हैं ।

आईबी गृह मंत्रालय के अधीन है जो सीधे गृह सचिव और गृह मंत्री को रिपोर्ट करती है मगर रॉ कैबिनेट सचिव के अंडर कार्य करती है जो भारत सरकार में सबसे बड़े अधिकारी होते हैं , जो सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करते हैं । कैबिनेट सचिव तीनों सेनाओं के सेनाध्यक्ष , भारत सरकार के सचिव आदि से ऊपर सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी हैं उनका कार्यालय राष्ट्रपति भवन में होता है , अर्थात वे राष्ट्रपति और पीएम दोनों को रिपोर्ट कर सकते हैं । रॉ डायरेक्ट इनको रिपोर्ट करते हैं मगर पीएम के निरंकुश और अति शक्तिशाली होने पर प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी रिपोर्ट ले सकते हैं जो सीधे पीएम को रिपोर्ट करते हैं , जबकि आईबी गृह सचिव या गृह मंत्री को ही रिपोर्ट करती है ।

सीबीआई की स्थापना 1941 में अंग्रेजों ने ही की थी जिसका उद्देश्य युद्ध सामग्री के लेन देन में हुये भ्रष्टाचार की जाँच करना था जिसे 1946 के “DELHI POLICE ESTABLISHMENT ACT 1946” के तहत पुनर्गठित किया गया है और 1963 के तहत इसको “केंद्रीय जाँच अन्वेषण ब्यूरो (CBI)” नाम दिया गया जिसका अधिकारक्षेत्र इसके स्थापना के एक्ट में स्पष्ट किया गया है जो इसकी स्थापना के “अनुच्छेद 5 और 6” में स्पष्ट है । इनके अनुसार —-

1, सीबीआई केंद्रीय सरकार के विभागों में भ्रष्टाचार की जाँच कर सकती है ।

2,सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) यानी केंद्रीय बैंक , ONGC , आदि केंद्रीय संस्थाओं में हुए भ्रष्टाचार की जाँच कर सकती है ।

3, राज्यों की “सहमति से राज्यों में भी” जाँच कर सकती है ।

यह एजेंसी कोई संवैधानिक एजेंसी नहीं है बल्कि केंद्रीय आदेश पर बनाई गई एजेंसी है । कोई भी राज्य इसे अपने राज्य क्षेत्र में जाँच करने से रोक सकता है । बिना राज्य की अनुमति के यह एजेंसी राज्य के अधिकारक्षेत्र में जाँच नहीं कर सकती लेकिन हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जाँच कर सकती है क्योंकि ये आदेश किसी भी राज्य सरकार पर बाध्यकारी हैं ।

अमेरिका में FBI हो या CIA , कार्य तो राष्ट्रपति के अधीन करते हैं मगर ये संसद की कमेटी ( कांग्रेसनलन कमेटी ) के प्रति उत्तदायी हैं । राष्ट्रपति इनसे अनावश्यक कार्य नहीं करवा सकते इसी तरह ब्रिटेन और इजराइल की एजेंसियों में संसद का नियंत्रण लगाया गया है लेकिन हमारे देश में ये तीनों एजेंसियाँ संसद के प्रति उत्तरदायी नहीं हैं बल्कि केंद्र सरकार के सीधे नियंत्रण में हैं जिन पर कोई भी “चेक इन बैलेंस” नहीं लगाया गया है और समस्या यहीं से शुरू होती है जिससे प्रधानमंत्री इनका दुरुपयोग करते रहते हैं ।

अथाह ताकत और संसाधन वाली ये एजेंसियाँ किसी भी हद तक जा सकती हैं । अपने ही देश में बम ब्लास्ट करने तक भी , पुरुलिया कांड इसका उदाहरण है । सरकारों को पलटने या नागरिकों को उठवाने या जनमत बनाने तक । अब समय आ गया है कि इन एजेंसियों को या तो संसद के प्रति उत्तरदायी बनाया जाए या सीबीआई को संवैधानिक बनाकर ही इस एजेंसी को स्थापित किया जाए , अन्यथा इसका दुरुपयोग होता रहेगा।

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