द्रोणागिरि गांव उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ में नीति मार्ग पर स्थित है। यहां सदियों से हनुमानजी के पूजन पर रोक है क्योंकि कहा जाता है कि हनुमानजी लक्ष्मण जी को बचाने के लिए इसी स्थान से संजीवनी पर्वत उठाकर ले गए थे। इस गांव में लाल रंग का झंडा लगाने पर भी पाबंदी है।

स्थानीय लोगों के अनुसार जब हनुमान बूटी लेने के लिए इस गांव में पहुंचे तो वे भ्रम में पड़ गए। जब उन्हें कुछ भी समझ नही आया कि किस पहाड़ पर संजीवनी बूटी हो सकती है। तब गांव में उन्हें एक वृद्ध महिला दिखाई दी। उन्होंने पूछा कि संजीवनी बूटी किस पर्वत पर होगी? तो उस वृद्ध महिला ने द्रोणागिरि पर्वत की तरफ इशारा किया। हनुमान उड़कर पर्वत पर गए लेकिन संजीवनी कहां होगी यह पता न कर सके। इसलिए वो पूरा पर्वत ही वंहा से उठा कर ले गए। कहा जाता है कि जिस वृद्धा ने हनुमान की मदद की थी उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया। आज भी इस गांव के आराध्य देव पर्वत की विशेष पूजा पर लोग महिलाओं के हाथ का दिया नहीं खाते हैं और न ही महिलाएं इस पूजा में भाग लेती हैं।

श्रीलंका के सुदूर इलाके में श्रीपद नामक एक पर्वत है। माना जाता है कि यह वही पर्वत है, जिसे हनुमानजी संजीवनी बूटी के लिए उठाकर लंका ले गए थे। इस पर्वत को एडम्स पीक भी कहा जाता है। यह पहाड़ करीब 2200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। श्रीलंका के लोग इसे रहुमाशाला कांडा कहते हैं। इस पर्वत पर एक मंदिर भी बना है। संजीवनी बूटी से लक्ष्मण के प्राण तो बच गए लेकिन द्रोणागिरि गांव के लोग हनुमानजी से नाराज हो गए। उस दिन से आज तक यहां हनुमानजी की पूजा पर पाबंदी है।

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