आईटी सेक्टर को कभी जॉब के लिहाज से सबसे अच्छा माना जाता था । पश्चिमी जगत के मुकाबले सस्ते में काम करने की क्षमता के दम पर मजबूत हुए आईटी आउसोर्सिंग सर्विसेज सेक्टर ने एजुकेटेड मिडल क्लास में उम्मीदों और तरक्की की नई चमक पैदा की थी। हालांकि उस इंडियन ड्रीम को झटका लग चुका है।अमेरिकी फर्मों को स्पेशलिटी सेगमेंट्स में अस्थायी तौर पर विदेशी कामगार हायर करने की इजाजत देने वाले एच-1बी वीजा पर प्रतिबंध लग चुका है। वह भी ऐसे वक्त, जब दूसरी वजहों से भी आईटी सर्विसेज सेक्टर की हालत पतली दिख रही है। ऐसे में इंडियन आईटी सेक्टर को कॉम्पिटिशन में बने रहने और अपने करीब 40 लाख कर्मचारियों को बनाए रखने के लिए दशकों पुराना बिजनस मॉडल बदलना होगा। हालांकि इनमें सभी लोगों की जॉब नहीं बचेगी।आईटी वर्कर्स की ही तरह इंडिया की लगभग 48 करोड़ वर्कफोर्स के सामने भी समस्या है। एक दशक पहले अपने पीक पर रहने के दौरान टेलिकॉम इंडस्ट्री में 40 लाख से ज्यादा वर्कर थे, लेकिन अब कंसॉलिडेशन (वोडाफोन-आइडिया और एयरसेल-आरकॉम) और टेक्नॉलजी के मामले में प्रगति ने हालात बदल दिए हैं। ।एजुकेटेड वाइट कॉलर वर्कर्स की दिक्कतों की तो मीडिया में भी खूब चर्चा होती है, लेकिन मीडिया की नजरों से दूर दूसरे कर्मचारियों के बीच जॉब क्राइसिस की जमीन लंबे समय से बन रही है। लोअर एंड पर ज्यादातर अकुशल और अशिक्षित मजदूर हैं। वहां संकट कहीं ज्यादा गहरा है। इंडिया में लेबर डेटा एक तो बहुत अंतराल पर आता है और उसमें पूरी पिक्चर भी नहीं दिखती। लेबर ब्यूरो सर्वे के मुताबिक, 2015 में इंडिया में आईटी-बीपीओ, टेक्सटाइल्स, गारमेंट्स और ऑटोमोबाइल्स सरीखे ज्यादा श्रम की जरूरत वाले आठ एक्सपोर्ट आधारित सेक्टरों में महज 1.35 लाख जॉब्स जुड़ीं। 2014 की एक क्रिसिल रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि 2011-12 और 2018-19 के दौरान इंडिया में कृषि क्षेत्र से इतर केवल 3.8 करोड़ जॉब्स जुड़ेंगी, जबकि 2004-05 से 2011-12 के बीच ऐसी 5.2 करोड़ नौकरियों के मौके बने थे।

 

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