कोटद्वार-कालागढ़-रामनगर GMOU की बस वन विभाग से होकर गुजरने पर सुप्रीम कोर्ट की रोक। जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद लगी रोक

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नई दिल्ली- गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (सीटीआर) के परिसर में प्राइवेट बस सेवा के संचालन पर रोक लगा दी है। साथ ही कोर्ट ने केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय, नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ, नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी, उत्तराखंड सरकार, उत्तराखंड के कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के मुख्य वन्यजीव वॉर्डन तथा निदेशक को निजी बसों को चलाने के लिए नोटिस भी जारी किया। यह जानकारी एडवोकेट और वाइल्डलाइफ एक्टिविस्ट गौरव कुमार बंसल द्वारा दी गयी।बंसल ने बताया कि उनकी जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने सीटीआर निदेशक के आदेश को लागू करने पर रोक लगा दी है, जिसमें प्राइवेट बसों को रिजर्व में प्रवेश करने की इजाजत दी गई थी। पिछले साल दिसंबर में उत्तराखंड वन विभाग ने गढ़वाल मोटर ओनर्स यूनियन लिमिटेड को “कोटद्वार से रामनगर वाया कालागढ़” कॉर्बेट के माध्यम से बस सेवा शुरू करने की अनुमति दी। जिससे राज्य के कुमाऊं और गढ़वाल डिवीजनों के बीच की दूरी 100 किलोमीटर से अधिक कम हो गई। राज्य के वन विभाग ने कोविड -19 के दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करते हुए अधिकतम 30 यात्रियों को ले जाने के लिए केवल एक बस को एक दिन में जाने देने की अनुमति दी थी।बंसल ने अपनी याचिका में कहा था कि सीटीआर के डायरेक्टर का कृत्य न केवल वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के विभिन्न प्रावधानों, जैसे कि धारा 38 (ओ) और धारा 38 (वी) के खिलाफ है, बल्कि शीर्ष अदालत द्वारा जारी किए गए आदेशों के खिलाफ भी है, जिसमें कोर्ट ने कहा है कि सीटीआर को संरक्षित किया जाना चाहिए।बंसल ने कहा कि उन्होंने जनहित याचिका इसलिए दायर की क्योंकि वे उत्तराखंड के वन विभाग द्वारा किए गए गैरकानूनी काम को उजागर करना चाहते थे। इसमें विभाग के अधिकारियों ने एक निजी क्षेत्र की कंपनी को गलत तरीके से लाभ पहुंचाने के लिए उन्हें अपने निजी बस को अनुमति दी थी। उन्होंने कहा कि सीटीआर के डायरेक्टर ने प्राइवेट बसों के परिचालन संबंधी यह आदेश 23 दिसंबर 2020 को जारी किया था।

उन्होंने कहा, ”इस ऑर्डर से न केवल जमीन के कानून का उल्लंघन हुआ है, बल्कि उन्होंने राष्ट्रीय पशु टाइगर की सुरक्षा, संरक्षण के साथ भी समझौता किया है।

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