हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतीक अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा में सरकार नाकाम: इंद्रेश मैखुरी

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इंद्रेश मैखुरी

अमरनाथ यात्रा से लौट रही यात्रियों की बस पर हुए दहशतगर्दों के हमले में सात लोगों को जान गंवानी पड़ी और तीस से अधिक लोग घायल हो गए। यह बेहद निंदनीय घटना है.निहत्थे तीर्थ यात्रियों से भरी बस पर हमले की घटना दर्शाती है कि हिंसा करके, दहशत का माहौल कायम रखना ही आतंकियों का लक्ष्य है।
अमरनाथ यात्रियों पर इस हमले के गंभीर निहितार्थ हैं.अमरनाथ इस देश में साम्प्रदायिक सौहार्द के प्रतीकों में से एक है अमरनाथ की गुफा की खोज एक मुस्लिम बकरवाल यानि चरवाहे ने की थी। यही वजह थी कि इस बकरवाल परिवार के वंशज अमरनाथ की गुफा की देखरेख में शामिल रहे हैं। इस तरह अमरनाथ, भारत की साझी विरासत का,इस देश की गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक भी है। इस यात्रा पर हमले का मतलब कौमी एकता को छिन्न-भिन्न करने की कोशिश है,जिसे किसी सूरत में कामयाब नहीं होने दिया जाना चाहिए।
काफी दिनों से अखबारों में इस आशय की खबरें आ रहीं थी कि अमरनाथ यात्रा पर हमला हो सकता है। जाहिर सी बात है कि ऐसी वारदात की आशंका,गुप्तचर एजेंसियां पहले जता चुकी थी। लेकिन दहशतगर्दी की घटना के पूर्वानुमान के बावजूद यदि वारदात को अंजाम देने में दहशतगर्द कामयाब रहते हैं तो इस चूक के लिए कौन उत्तरदायी है? जम्मू-कश्मीर और केंद्र में एक ही गठबंधन की सरकार है। इसलिए जिम्मेदारी यदि किसी पर आयद होगी तो केंद्र और जम्मू-कश्मीर की सरकार पर ही आयद होगी कि गुप्तचर एजेंसियों द्वारा हमले की आशंका जताए जाने के बावजूद आतंकियों के मंसूबों को क्यूँ विफल नहीं किया जा सका?
परन्तु सत्ताधारी भाजपा और उसके समर्थकों ने तो नया चलन शुरू किया है। कोई वारदात होते ही वे कम्युनिस्टों से सवाल पूछना शुरू करेंगे,मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से सवाल पूछना शुरू करेंगे पर सरकार से कुछ ना कहेंगे। भाई लोगों जिन से आप सवाल पूछ रहे हो,वो सत्ता में नहीं हैं। और यह भी याद रखो कि तुम विपक्ष में नहीं हो। बाकी लोग प्रतिक्रिया देंगे,क्या कहेंगे,इससे ज्यादा महत्वपूर्ण तो सरकार की भूमिका है.आखिर मजबूत सरकार होने का दावा करने वाले मोदी जी के राज में इस तरह की वारदातें कैसे हो जाती हैं?जम्मू-कश्मीर की सत्ता में भाजपा की हिस्सेदारी क्या सिर्फ सत्ता सुख भोगने के लिए है?
उक्त घटना में सबसे साहसिक काम तो बस के ड्राईवर सलीम मिर्जा ने किया। आतंकियों की गोलीबारी के बावजूद सलीम मिर्जा ने बस नहीं रोकी.इस वजह से ही काफी लोगों की जान बच सकी। इस जघन्य वारदात के खिलाफ कश्मीर घाटी से लेकर दिल्ली तक विरोध प्रदर्शन हुए.कश्मीर में मानावाधिकार कार्यकर्ताओं ने श्रीनगर के लाल चौक पर स्थित प्रताप सिंह पार्क में अमरनाथ यात्रियों पर हमले की घटना के खिलाफ धरना दिया.दिल्ली में भी “not in my name” अभियान की तरफ से जन्तर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया.साफ़ है कि कश्मीर से लेकर दिल्ली तक,वामपंथियों से लेकर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं तक सब इस हमले के विरोध में खड़े हैं.मामला वैसा कतई नही है,जैसा भाजपा और उसके समर्थक, अपनी सरकार की नाकामी छुपाने के लिए प्रचारित कर रहे हैं।  अमरनाथ यात्रा पर हमलों का इतिहास देखेंगे तो पायेंगे कि भाजपा की पिछली केंद्र सरकार के राज में 2000,2001 और 2002 में निरंतर अमरनाथ यात्रियों पर हमले हुए.जवाब तो उन्हें देने चाहिए कि उनके राज में ये निरंतर हमले क्यूँ कामयाब होते हैं? कांग्रेसी राज में 2006 में भी इस यात्रा पर हमला हुआ था।
कश्मीर को हिंसा के जिस अंतहीन चक्र में धकेल दिया गया है,उससे बाहर निकालने के लिए कुछ ठोस प्रयासों की जरुरत है.धरती का जन्नत कहे जाने वाला कश्मीर,अंतहीन समय तक बंदूकों के साए तले दोजख में तब्दील नहीं रह सकता है.कश्मीर को जन्नत से दोजख बनाए जाने की प्रक्रिया में, कल मारे गए सभी तीर्थयात्रियों को श्रद्धांजलि।

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